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Sunday, 3 July 2016

Gk History

*स्मरणीय तथ्य*



चंदेल शासक धंग ने अपने अंतिम समय में प्रायः के संगम में डूबकर अपने जीवन का अंत कर किया था।

राजपूत काल में महिलाओं को सम्मानित स्थान प्राप्त था। लेकिन जौहर और सती प्रथा का प्रचलन भी था।

राजपूत काल में ब्राह्मण तथा जैन धर्म अधिक लोकप्रिय थे। दिलवाड़ा के जैन मंदिर में जैन तीर्थंकर आदिनाथ की मूर्ति है।

राजपूतो की उत्पत्ति विदेशी मूल से हुई- इस मत के समर्थन में विद्वानों ने गुर्जर-प्रतिहार वंश को ‘खंजर’ नामक जाति की संतान कहा है, जो हूणों के साथ भारत आयी थी।

इतिहास के प्रसिद्द चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय सोमेश्वर का पुत्र था।

खालीमपुर लेख से पता चलता है की बंगाल मत्स्यन्याय शासन से मुक्ति दिलाने के लिए जनता ने गोपाल नमक सेनानायक को राजा बनाया।

धर्मपाल ने कन्नौज में एक बड़े दरबार का आयोजन किया था, जिसमे भोज, मत्स्य, मद्र, कुरु, युदु, यवन, अवन्ति, गंधार तथा कीर आदि शासकों ने भाग लिया था।

सेन वंशीय शासक लक्ष्मण सेन के समय बख्तियार खिलजी ने लखनौती पर आक्रमण किया, जिसमे लक्ष्मण सेन को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा।

12वीं सदी में उत्तर भारत में प्रभुत्व स्थापित करने के लिए चंदेलों, गहड़वालों और चौहानों के बीच संघर्ष हुआ, जिसे ‘त्रिपक्षीय संघर्ष’ कहा जाता है।

दिगंबर जैन धार्मिक सम्प्रदाय के अनुयायियों को अस्पृश्य माना जाता था।

बीसलदेव ने आनासागर झील तथा बीसलसागर नामक तालाब का निर्माण करवाया था।
[7/2, 9:29 PM] ‪+91 97996 62213‬: *बंगाल के पाल एवं सेन वंश*



पाल वंश की स्थापना गोपाल (750-770 ई.) नामक एक सेनानायक ने की थी।

गोपाल के पश्चात उसका पुत्र धर्मपाल (770-810 ई.) पाल वंश की गद्दी पर बैठा।

धर्मपाल एक बौद्ध धर्मानुयायी शासक था। इसने विक्रमशिला विश्वविद्यालय एवं उदन्तपुर विश्वविद्यालय की स्थापना की।

गुजराती कृति सोडढल ने धर्मपाल को उत्तरापथके स्वामी की उपाधि से सम्बंधित किया। धर्मपाल के लेखों में उसे ‘परम सौगात’ कहा गया है।

देवपाल (810-850 ई.) अपने पिता धर्मपाल की भांति साम्राज्यवादी था। अरब यात्री सुलेमान ने देवपाल को प्रतिहार, प्रतिहार, राष्ट्रकूट शासकों से अधिक शक्तिशाली बताया है।

महीपाल प्रथम ने (988-1038 ई.) ने पाल वंश की शक्ति तथा प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित करके अपनी योग्यता सिद्ध की।

संध्याकर नंदी द्वारा रचित ‘रामपालचरित’ पुस्तक में नायक रामपाल (1077-1120 ई.) को इस वंश का अंतिम शासक माना जाता है।

रामपाल की शासनावधि में ही ‘कैवर्तों का विद्रोह’ हुआ था, जिसका वर्णन राम्पल्चारित में मिलता है।

पाल शासकों के साम्राज्य का विस्तार सम्पूर्ण बंगाल, बिहार तथा कन्नौज तक था। इनका शासन बंगाल की खाड़ी से लेकर दिल्ली तक तथा जालंधर से लेकर विन्ध्य पर्वत तक फैला हुआ था।




*सेन वंश*



पाल वंश के पतन के बाद सेन वंश के शासकों ने बंगाल और बिहार में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली। इनकी राजधानी लखनौती थी।

सेन वंश के शासक मूलतः कर्णाटक (कर्नाटक) के निवासी थे, जो बंगाल में आकर बस गए थे।

इस वंश के शासकों ने पुरी, काशी तथा प्रयाग में विजय स्तंभ स्थापित किये थे, जिससे यह पता चलता है कि सेन शासकों ने समकालीन शासकों से काशी और प्रयाग छीनकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया था।

इस वंश का शासक सामंत सेन था, जिसे ब्राह्मण क्षत्रिय कहा गया है। विजय सेन (1095-1158 ई.) सबसे प्रतापी शासक था। इसने विजयपुरी तथा विक्रमपुर की स्थापना की थी।

विजयसेन की मृत्यु के बाद बल्लालसेन बंगाल का शासक बना। इसने बंगाल में जाति प्रथा तथा कुलीन प्रथा को संगठित करने का श्रेय दिया जाता है।

बल्लाल्सेन एक विद्वान् शासक था। इसने ‘दासनगर’ और ‘अद्भुत सागर’ दो ग्रंथों की रचना की।

लक्ष्मण सेन एक विजेता तथा साम्राज्यवादी शासक था। इसने गहड़वाल शासक जयचंद्र को पराजित किया था।

लक्ष्मणसेन के दरबार में अनेक प्रसिद्द विद्वान तथा लेखक निवास करते थे। इनमे जयदेव, धोयी और हलायुद्ध के नाम उल्लेखनीय हैं।
[7/2, 9:29 PM] ‪+91 97996 62213‬: *बुंदेलखंड के चंदेल*



प्रारम्भिक चंदेल प्रतिहारों के सामंत थे। चंदेलों को अत्री के पुत्र चन्दात्रेय का वंशज कहा जाता है।

इस वंश का प्रथम शासक नन्नुक था उसके पौत्र जयसिंह अथवा गेजा के नाम पर यह प्रदेश जेजाकभुक्ति के नाम से प्रसिद्द हुआ।

हर्ष (900-925 ई.) रहिद का पुत्र था। इसने प्रतिहारों से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की। खजुराहो अभिलेख में इसे परम भट्टारक कहा गया है, जो उसको स्वतंत्र स्थिति को प्रकट करता है।

यशोवर्मन (930-950 ई.) इस वंश का महत्वपूर्ण शासक था। इसने मालवा और चेरि पर आक्रमण करके अपने साम्राज्य के विस्तार किया।

खजुराहो अभिलेख में यशोवर्मन की विजयों एवं पराक्रम का वर्णन मिलता है।

यशोवर्मन ने खजुराहो में विष्णु को समर्पित चतुर्भुज मंदिर का निर्माण कराया। यशोवर्मन का पुत्र धंग (950-1008 ई.) इस वंश का प्रसिद्द शासक था।इसने कालिंजर को अपनी राजधानी बनाया। ग्वालियर की विजय धंग की सबसे महत्वपूर्ण सफलता थी।

फ़रिश्ता के अनुसार धंग सुबुक्तगीन के विरुद्ध भटिंडा के शाही वंश के शासक जयपाल द्वारा बनाये गए संघ में शामिल हुआ, जिसे सुबुक्तगीन ने पराजित कर दिया था।

धंग एक महान मंदिर निर्माता था। इसने अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया जिनमे जिजनाथ, विश्वनाथ, वैद्यनाथ आदि मंदिर उल्लेखनीय हैं।

यह प्रतापी शासक था। इसने न सिर्फ महमूद गजनवी का सफल प्रतिरोध किया, बल्कि उसे संधि करने के लिए बाध्य किया।

बुंदेलखंड के चंदेल शासकों में परमार्दिदेव अथवा परिमल अन्तिम शक्तिशाली शासक था। प्रसिद्द योद्धा आल्हा और ऊदल चंदेल शासक परिमल के राजाश्रय में थे।

आल्हा और ऊदल ने पृथ्वीराज चौहान से महोबा की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया।



*चेदि राजवंश*



चेदि राजवंश के शासकों को त्रिपुरी के कलचुरी वंश के नाम से भी जाना जाता है।

कोक्कल प्रथम इस वंश का प्रथम शासक था। इसने कन्नौज के प्रतिहार शासक मिहिरभोज को पराजित किया था।

चेदि शासक लक्ष्मणराज ने बंगाल, उड़ीसा तथा कौशल को तथा पश्चिम में गुर्जर, लाट शासक एवं अमीरों को जीता।

कोक्कल द्वितीय के शासनकाल में कुलचुरियों की शक्ति पुनर्स्थापित हुई। इसने गुजरात के चालुक्य वंशीय शासक चामुण्डराज को पराजित किया।

गांगेयदेव (1019-1041 ई.) ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी। इसने अंग, उत्कल, प्रयाग पर अधिकार कर लिया तथा पाल शासकों से कशी छीन ली।

विजय सिंह इस वंश का अंतिम शासक था। तेहरवीं शताब्दी के आरंभ में चंदेल शासक त्रैलोक्य वर्मन ने इसे पराजित कर त्रिपुरी पर अधिकार कर लिया।

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