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Saturday, 2 July 2016

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*भूकंप* (अंग्रेज़ी:Earthquake)
              पृथ्वी की बाह्य परत में अचानक हलचल से उत्पन्न ऊर्जा के परिणाम स्वरूप को कहते हैं। यह उर्जा पृथ्वी की सतह पर, भूकंपी तरंगें उत्पन्न करता है, जो भूमि को हिलाकर या विस्थापित करके प्रकट होता है। भूगर्भ में भूकंप के उत्पन्न होने का प्रारंभिक बिन्दु को केन्द्र या हाईपो सेंटर कहा जाता है। हाईपो सेंटर के ठीक ऊपर ज़मीन के सतह पर जो बिंदु है उसे अधिकेन्द्र कहा जाता है। भूकंपी तरंगें मूलतः तीन प्रकार के होते हैं।

प्राइमरी तरंग (P wave)सेकंडरी तरंग (S wave)सतही तरंगें (surface waves)।

इनमें से सबसे खतरनाक और क्षतिकारक सतही तरंगें ही होते हैं।

*भूकंप की उत्पत्ति*

भूकंप की उत्पत्ति के बारे में समझने के लिए ज़रूरी है पृथ्वी के अंदरूनी संरचना के बारे में समझना। धरती की ऊपरी परत फ़ुटबॉल की परतों की तरह आपस में जुड़ी हुई है या कहें कि एक अंडे की तरह से है जिसमें दरारें हों। उपरी सतह से लेकर अन्तर्भाग तक, पृथ्वी, कई परतों में बनी हुई है। पृथ्वी की बाहरी सतह कई कठोर खंडों या विवर्तनिक प्लेट में विभाजित है जो क्रमशः कई लाख सालों की अवधी में पूरे सतह से विस्थापित होती है। पृथ्वी का आतंरिक सतह एक अपेक्षाकृत ठोस भूपटल की मोटी परत से बनी हुई है और सबसे अन्दर होता है एक कोर, जो एक तरल बाहरी कोर और एक ठोस लोहा का आतंरिक कोर से बनी हुई है। बाहरी सतह के जो विवर्तनिक प्लेट हैं वो बहुत धीरे धीरे गतिमान हैं। यह प्लेट आपस में टकराते भी हैं और एक दुसरे से अलग भी होते हैं। ऐसी स्थिति में घर्षण के कारण भूखंड या पत्थरों में अचानक दरारें फुट सकती हैं। इस अचानक तेज हलचल के कारण जो शक्ति उत्सर्जित होती है, वही भूकंप के रूप में तबाही मचाती है।

*भूकंप के कारण*

भूकंप प्राकृतिक घटना या मानवजनित कारणों से हो सकता है। अक्सर भूकंप भूगर्भीय दोषों के कारण आते हैं। भारी मात्रा में गैस प्रवास, पृथ्वी के भीतर मुख्यतः गहरी मीथेन, ज्वालामुखी, भूस्खलन और नाभिकीय परीक्षण ऐसे मुख्य दोष हैं।

*प्लेट सीमाएं*

प्लेट सीमाएं तीन प्रकार के होते हैं।

रूपांतरित (transform)अपसारी (divergent)अभिकेंद्रित (convergent)।

ज़्यादातर भूकंप रूपांतरित या फिर अभिकेंद्रित सीमाओं पर होती है। रूपांतरित सीमाओं पर दो प्लेट एक दुसरे से घिसकर जाते हैं। इस घर्षण के कारण दो प्लेट के सीमा पर तनाव उत्पन्न होता है। यह तनाव बढते बढते ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जब भूगर्भीय पत्थर इस तनाव को झेल न पाने के कारण अकस्मात टूटते हैं। तनाव उर्जा का यह अचानक बाहर आना ही भूकंप को जन्म देता है। अभिकेंद्रित प्लेट सीमाओं में एक प्लेट दुसरे प्लेट से टकराता है। ऐसे में या तो एक प्लेट दुसरे प्लेट के नीचे सरक जाता है (जो महाद्वीपीय और समुद्रीय किनारे के टकराव में होता है) या फिर पर्वत-श्रंखला का जन्म होता है (जो दो महाद्वीपीय किनारों के टकराव में होता है)। दोनों ही स्थिति में प्लेट सीमाओं पर भयानक तनाव उत्पन्न होता है जिसके अचानक निष्कासन से भूकंप होता है। ज़्यादातर गहरे केन्द्र वाले भूकंप अभिकेंद्रित सीमा पर होता है। 70 किलोमीटर से कम की गहराई पर उत्पन्न होने वाले भूकंप 'छिछले-केन्द्र' के भूकंप कहलाते हैं, जबकि 70-300 किलोमीटर के बीच की गहराई से उत्पन्न होने वाले भूकंप 'मध्य-केन्द्रीय' भूकंप कहलाते हैं। सबडक्शन क्षेत्र (subduction zones) में जहाँ पुरानी और ठंडी समुद्री परत अन्य टेक्टोनिक प्लेट के नीचे खिसक जाती है, गहरे केंद्रित भूकंप (deep-focus earthquake) अधिक गहराई पर (300 से लेकर 700 किलोमीटर तक) आ सकते हैं। अपसारी प्लेट सीमाओं पर भी ज्वालामुखिओं के कारण भूकंप होते रहते हैं। जहाँ प्लेट सीमायें महाद्वीपीयस्थलमंडल में उत्पन्न होती हैं, विरूपण प्लेट की सीमा से बड़े क्षेत्र में फ़ैल जाता है। महाद्वीपीय विरूपण सान अन्द्रिअस दोष (San Andreas fault) के मामले में, बहुत से भूकंप प्लेट सीमा से दूर उत्पन्न होते हैं और विरूपण के व्यापक क्षेत्र में विकसित तनाव से सम्बंधित होते हैं।

सभी टेक्टोनिक प्लेट्स में आंतरिक दबाव क्षेत्र होते हैं जो अपनी पड़ोसी प्लेटों के साथ अंतर्क्रिया के कारण या तलछटी लदान या उतराई के कारण होते हैं। ये तनाव उपस्थित दोष सतहों के किनारे विफलता का पर्याप्त कारण हो सकते हैं, ये अन्तःप्लेट भूकंप (intraplate earthquake) को जन्म देते हैं। भूकंप अक्सर अन्तःप्लेट क्षेत्रों में भी ज्वालामुखी के कारण उत्पन्न होते हैं। यहाँ इनके दो कारण होते हैं, टेक्टोनिक दोष तथा ज्वालामुखी में लावा (magma) की गतिविधि। ऐसे भूकंप ज्वालामुखी विस्फोट की पूर्व चेतावनी भी हो सकते हैं। एक क्रम में होने वाले अधिकांश भूकंप, स्थान और समय के संदर्भ में एक दूसरे से सम्बंधित हो सकते हैं। मुख्य झटके से पूर्व या बाद भी झटके आ सकते हैं।

*भूकंप का मापन*

भूकंप का रिकार्ड एक सीस्मोमीटर के साथ रखा जाता है, जो सीस्मोग्राफ भी कहलाता है। एक भूकंप का परिमाण पारंपरिक रूप से मापा जाता है, या सम्बंधित और अप्रचलित रियेक्टर परिमाण लिया जाता है। 3 या उससे कम परिमाण की रियेक्टर तीव्रता का भूकंप अक्सर अगोचर होता है और 7 रियेक्टर की तीव्रता का भूकंप बड़े क्षेत्रों में गंभीर क्षति का कारण होता है। झटकों की तीव्रता का मापन विकसित मरकैली पैमाने पर किया जाता है।

*भूकंप धरती की सतह से गहराई में*

वैसे अगर हम भूकंप के कारणों की बात करें तो वैज्ञानिक बताते हैं कि धरती या समुद्र के अंदर होने वाली विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के कारण ये भूकंप आते हैं। अधिकांश भूकंपों की उत्पत्ति धरती की सतह से 30 से 100 किलोमीटर अंदर होती है। सतह के नीचे धरती की परत ठंडी होने और कम दबाव के कारण भंगुर होती है। ऐसी स्थिति में जब अचानक चट्टानें गिरती हैं तो भूकंप आता है। एक अन्य प्रकार के भूकंप सतह से 100 से 650 किलोमीटर नीचे होते हैं। इतनी गहराई में धरती इतनी गर्म होती है कि सिद्धांतत: चट्टानें द्रव रूप में होनी चाहिए, यानि किसी झटके या टक्कर की कोई संभावना नहीं होनी चाहिए। लेकिन ये चट्टानें भारी दबाव के माहौल में होती हैं। इसलिए यदि इतनी गहराई में भूकंप आए तो निश्चय ही भारी ऊर्जा बाहर निकलेगी।

धरती की सतह से काफ़ी गहराई में उत्पन्न अब तक का सबसे बड़ा भूकंप 1994 में बोलीविया में रिकॉर्ड किया गया। सतह से 600 किलोमीटर दर्ज इस भूकंप की तीव्रता रियेक्टर पैमाने पर 8.3 मापी गई थी। हालाँकि वैज्ञानिक समुदाय का अब भी मानना है कि इतनी गहराई में भूकंप नहीं आने चाहिए क्योंकि चट्टान द्रव रूप में होते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि विभिन्न रासायनिकों क्रियाओं के कारण ये भूकंप आते होंगे। अत्यंत गहराई में आने वाले भूकंपों के बारे में ताज़ा अध्ययन यूनवर्सिटी कॉलेज, लंदनके मिनरल आइस एंड रॉक फिज़िक्स लैबोरेटरी में किया गया है। वैज्ञानिकों ने धरती की सतह के काफ़ी भीतर आने वाले भूंकपों की ही तरह नकली भूकंप प्रयोगशाला में पैदा करने में सफलता पाई है। ऐसे भूकंप आमतौर पर धरती की सतह से सैंकड़ों किलोमीटर अंदर होते हैं, और वैज्ञानिकों की तो यह राय है कि ऐसे भूकंप वास्तव में होते नहीं हैं। वैज्ञानिकों ने इन कथित भूकंपों को प्रयोगशाला में इसलिए पैदा किया कि इसके ज़रिए धरती की अबूझ पहेलियों को समझा जा सके। ताज़ा प्रयोगों से धरती पर आए भीषणतम भूकंपों में से कुछ के बारे में विस्तृत जानकारी मिल सकेगी।

भूकंप की तीव्रता तथा प्रभाव[1]रिक्टर पैमाने पर
 *तीव्रताप्रभाव*0 से 1.9सिर्फ सीज्मोग्राफ से ही पता चलता है।2 से 2.9हल्का कंपन।3 से 3.9कोई ट्रक आपके नजदीक से गुजर जाए, ऐसा असर।4 से 4.9खिड़कियां टूट सकती हैं। दीवारों पर टंगी फ्रेम गिर सकती हैं।5 से 5.9फर्नीचर हिल सकता है।6 से 6.9इमारतों की नींव दरक सकती है। ऊपरी मंजिलों को नुकसान हो सकता है।7 से 7.9इमारतें गिर जाती हैं। जमीन के अंदर पाइप फट जाते हैं।8 से 8.9इमारतों सहित बड़े पुल भी गिर जाते हैं।9 और उससे ज्यादापूरी तबाही। कोई मैदान में खड़ा हो तो उसे धरती लहराते हुए दिखाई देगी। यदि समुद्र नजदीक हो तो सुनामी आने की पूर्ण सम्भावना।भूकंप में रिक्टर पैमाने का हर स्केल पिछले स्केल के मुकाबले 10 गुना ज्यादा ताकतवर होता है।

I.A.S.(हिंदी माध्यम):
#Economics
=>कोर मुद्रास्फीति’ (Core Inflation) क्या है कोर इन्फ्लेशन? भारत में कोर इन्फ्लेशन कैसे मापते हैं?

इसका संबंध बास्केट में शामिल कमोडिटीज की कीमत में होने वाले बदलाव से है। इसमें फूड और फ्यूल जैसे कीमतों में ज्यादा उतार-चढ़ाव वाले आइटम शामिल नहीं हैं।

=>दुनिया भर के केंदीय बैंक हेडलाइन इनफ्लेशन के बजाय कोर इन्फ्लेशन पर क्यों करीबी नजर रखते हैं?

कीमत में बढ़ोतरी को मैनेज करने के लिए केंद्रीय बैंकों के लिए इकनॉमी में अंडरलाइंग प्रेशर को जानना जरूरी होता है, क्योंकि ज्यादा डिमांड से कीमतों में बढ़ोतरी होती है। कोर इन्फ्लेशन इसी का पता लगाता है। यह संकेत देता है कि मैन्यूफैक्चरर्स डिमांड में कमी के बगैर इनपुट कॉस्ट में बढ़ोतरी का बोझ दूसरों पर डालने में सक्षम हैं या नहीं? इसलिए कोर इनफ्लेशन से सेंट्रल बैंकों को हेडलाइन इन्फ्लेशन का अनुमान लगाने में मदद मिलती है।

=>क्या कोर इन्फ्लेशन का असर मॉनिटरी पॉलिसी पर पड़ता है?

ऊंचा कोर इन्फ्लेशन इकनॉमी में डिमांड प्रेशर का संकेत देता है, जिससे कीमत में तेज बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। ऐसा होने पर केंद्रीय बैंक डिमांड कम करने और इन्फ्लेशन घटाने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है। अगर केंद्रीय बैंक सिर्फ हेडलाइन इन्फ्लेशन पर फोकस करता है, जिसमें फूड की ऊंची कीमतों के चलते बढ़ोतरी हो सकती है तो उसके मॉनिटरी सिग्नल अपेक्षित असर दिखाने में नाकाम हो सकते हैं, क्योंकि फूड के डिमांड पर इंटरेस्ट रेट्स का ज्यादा असर नहीं पड़ता। ऐसे में मॉनिटरी पॉलिसी का असर दूसरी जगह मसलन इन्वेस्टमेंट पर पड़ सकता है।

=>भारत में कोर इन्फ्लेशन को कैसे मापा जाता है?

भारत ने पिछले साल से देश भर में रीटेल इन्फ्लेशन की माप शुरू की। ऐतिहासिक आंकड़ों के अभाव में अब भी होलसेल प्राइस इंडेक्स ही कीमतों में बदलाव की माप करने वाला जरिया है। इसमें आइटम के तीन बड़ी कैटिगरी शामिल हैं- प्राइमरी आर्टिकल (इसमें फूड शामिल), फ्यूल और मैन्यूफैक्चर्ड गुड्स। कुछ इकनॉमिस्ट्स मैन्यूफैक्चर्ड गुड्स के इन्फ्लेशन को कोर इन्फ्लेशन की माप का जरिया मानते है, जबकि दूसरे सिर्फ नॉन-फूड मैन्यूफैक्चर्ड गुड्स पर विचार करने के लिए इसके और हिस्से करते हैं।

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